Krishan Dutt Bhardwajverified

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Studied Post Graduate Diploma in Business Administration from Symbiosis center of distance learning pune

in Sales and Marketing



Sidharth nice!

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विश्वास :~

यदि तुम विश्वास करते हो, तुम कभी भी जान नहीं पाओगे। यदि तुम सचमुच जानना चाहते हो, विश्वास मत करो। इसका यह मतलब नहीं होता है कि अविश्वास करो, क्योंकि अविश्वास अलग तरह का विश्वास है। विश्वास मत करो, पर प्रयोग करो। अपने पर जाओ, और यदि तुम देख सको, यदि तुम महसूस कर सको, तो ही विश्वास करो। लेकिन तब यह विश्वास नहीं रहता; तब यह श्रद्धा होती है। यह श्रद्धा और विश्वास में फर्क है: श्रद्धा अनुभव से आती है; विश्वास पूर्वाग्रह है जो अनुभव के सहारे के बिना है।

प्रयोग करो, सभी बातों के लिए अस्तित्वगत अनुभव के लिए जाओ। प्रयोगशाला बन जाओ--तुम्हारी अपनी प्रयोगशाला। और जब तक कि यह तुम्हारी अपनी समझ ना बने, विश्वास मत करो। और तब ही तुम श्रद्धा बन सकते हो। जिस सत्य पर विश्वास किया जाता है वह झूठ है। अनुभव का सत्य पूरी अलग ही घटना है। यह वैज्ञानिक मन का ढंग है।
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टीवी देखना :~

इस बात का ध्यान रखो कि तुम अपने मन के भीतर क्या ग्रहण करते हो। लोग बेखबर हैं; वे सब कुछ और कुछ भी पढ़े चले जाते हैं, टीवी पर कोई भी मूर्खतापूण बात देखे चले जाते हैं, फालतू की गपशप अदान-प्रदान किये चले जाते हैं और एक-दूसरे के सिर में कचरा डाले चले जाते हैं।

ऐसी परिस्थिति को टालो जिसमें तुम बेवजह के कचरे के बोझ तले भर दिए जाते हो। तुम्हारे पास पहले ही ढेर है। तुम्हें उससे हल्का होने की जरूरत है।

सिर्फ आवश्यक बातें सुनो और करो, और धीरे-धीरे तुम देखोगे की स्वच्छता, एक शुद्धता का भाव, ऐसे जैसे कि तुमने अभी-अभी स्नान लिया है, तुम्हारे भीतर उठने लगेगा। वह ध्यान के विकसित होने के लिए आवश्यक मिट्टी बनेगा। यदि तुम अपने मन में कुछ अंतराल खाली छोड़ देते हो, वे चेतना के खाली क्षण ध्यान की झलकें बन जाएंगे, उस पार की पहली झलक, अ-मन की पहली चमक।

ओशो.....♡
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